साहित्य चर्चा

कल दिनांक 17 दिसंबर 17 को विश्व संवाद केंद्र, भोपाल में कथा गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसकी अध्यक्षता श्री राजेंद्र शर्मा अक्षर ने की संस्था के अध्यक्ष श्री श्यामबिहारी सक्सेना एवं सचिव श्रीमती साधना बलवटे द्वारा आयोजित इस कॉर्यक्रम में कई साहित्यकारों ने अपनी कहानियां प्रस्तुत की। मुझे भी अपनी कहानी "कलियुग की अहिल्या" का पाठ करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । सभी की दृष्टि में कार्यक्रम इसलिए अत्यन्त सफल रहा की इसमें कई नये विषयों पर उत्कृष्ट कहानियां सुनने को मिली।प्रस्तुत है मेरे द्वारा पढ़ी गयी कहानी
कलियुग की अहिल्या
पंडित रामाधार ने भगवान् की पूजा, आरती,प्रसाद वितरण पश्चात् भगवान् को शयन कराया.सभी भक्त-गण मंदिर से जा चुके थे, उन्होंने आरती की थाली उठाई, चढौत्री गिनने लगे. कुल जमा बारह रूपये, पचास पैसे आये थे.उनके आँसू भर आये,बोले-भगवान्, ये कैसी परिक्षा ले रहे हैं आप ?
उन्हें याद आया, किराने वाले ने साफ कह दिया है कि पिछ्ला उधार चुकाओ, तभी अब सामान दे पायेंगे. पूरा परिवार दरिद्रता का शिकार. बच्चों की फीस का स्कूल से तकाजा. इस समय तो भरी बरसात में कोई सत्यनारायण की कथा या कोई पूजा-अनुष्ठान भी नहीं हो रहे कि उन्हें, पत्नी व बच्चों को कुछ भोजन-वस्त्र का इंतजाम हो सके.
वे बड़े आर्त्त स्वर में बोले- हे प्रभु, अगले जन्म में कम से कम ब्राह्मण तो बिलकुल मत बनाना. समाज में सम्मान भले ही मिल जाय, पर सम्मान से थोड़े ही पेट भरता है. मंदिर में पुजारी हैं सो सम्मान के कारण कोई मेहनत-मजदूरी कर नहीं सकते.इस घोर गरीबी में भी सरकारी सहायता की कोई आशा नहीं, क्योंकि सवर्ण हैं. घोर चिंताग्रस्त, तनाव में जैसे घर पहुंचे ही थे, कि खाली हाथ देखकर पत्नी ने तकाजा किया, क्योंजी, राशन नहीं लाये ? आज तो जैसे-तैसे दलिया खाकर कट जाएगा, कल के लिए पूरे डिब्बे-कनस्तर खाली पड़े हैं. इतना सुनना था कि उनका तनाव चरम सीमा पर पहुंच गया और भारी क्रोध में पत्नी को दो तमाचे जड़ दिए. क्रोध से लाल-लाल आँखें निकालते हुए तमतमाकर बोले- घर में घुसा नहीं कि हो गई टर्र-टर्र शुरू. एक तो मैं वैसे ही परेशान, और देवी जी को देखो तो चैन नाम की चीज ही नहीं. बड़ा करुण दृश्य था. पंडिताइन की रोते-रोते हिचकियाँ बंध गई. वो तो अच्छा था कि बच्चे सो रहे थे. यह क्रम एक माह से चल रहा था. तथापि पंडित जी को बाद में बहुत पछतावा हुआ और हर दिन की तरह माफी मांगते हुए मनाने की कोशिश करने लगे, पर आज तो पता नहीं क्या बात हो गई और दिन तो मनाने पर वो रोते-रोते शिकवे-शिकायत करती थीं, बच्चों का वास्ता देकर कुछ करने के लिए समझाती थी, और जैसे-तैसे मान जाती थी. परन्तु आज तो पंडितजी रात भर मनाते रहे पर वह एक शब्द तक नहीं बोल रहीं थीं.बस चुपचाप शून्य में देखते हुए पत्थर की शिला बन गई थी. आखिर पंडित जी थक-हार के सो गये. सुबह उठे तो वही हालत. बिलकुल शांत,चुपचाप,गूंगी-बहरी, न हँसती न रोती, जो कहो, यंत्रवत करती जाती. दोनों बच्चे भी रो-रोकर पूछ रहे थे कि मम्मी को क्या हो गया ? पर पंडित जी में उत्तर देने की शक्ति नहीं थी.अब तो कई दिनों से घर में मौन सन्नाटा पसरा हुआ था.न कोई शिकायत,न गुस्सा, न हंसी, न खिलखिलाहट,न कोई स्पंदन, न जीवन की कोई हलचल, बस शमशान जैसा सन्नाटा. घर का सबसे मजबूत आधार-स्तम्भ, नारी-शक्ति, जब वही ढह जाए तो कुछ भी शेष नहीं बचता.पंडिताइन सूनी आंखे. लिए दिन भर दीवाल से टिकी बैठी रहती, जैसे तैसे पंडित जी ही घरेलू मोर्चा संभाले हुए थे. मोहल्ले में लोगों ने देखा तो बोले भूत-प्रेत लग गये हैं, किसी ओझा को दिखाओ,पर कुछ समझदार बोले-किसी मनोचिकित्सक को दिखा दो.
जैसे-तैसे डाक्टर की फीस जुटाकर समय लिया. और उनसे मिलकर पूरी समस्या बताई. समस्या जानकार मनोचिकित्सक ने पंडिताइन को काउंसिलिंग की, परन्तु डाक्टर बोले जा रहे थे पंडिताइन सब सुनकर भी कुछ नहीं बोल रहीं थी. उन्होंने पंडितजी को बाहर भेज कर फिर जानने का प्रयत्न किया परन्तु वे सिर्फ हाँ-हूँ में उत्तर दे रही थी. डाक्टर ने समझाना शुरू किया. बोले- देखिये आप सभी समस्याओं को भूल जाइए. जीवन में सुख-दुःख तो आते रहते हैं. स्थितियाँ परिवर्तन शील होती हैं. मुझे पंडितजी ने बताया कि आप तो ग्रेजुएट हैं, पढी-लिखीं हैं. आप अपना और परिवार का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखें. “प्रापर-डाईट न लेने से मस्तिष्क में कुछ तत्वों की कमी हो जाती है, जो अवसाद को जन्म देती है. आप तो शिक्षित हैं, अवसाद ग्रस्त होने से बचें.डाक्टर को एक बात स्वयं समझ में नहीं आ रही थी कि वे जैसे-जैसे पंडिताइन को समझा रहे थे, उनकी आँखें लाल होती जा रही थी, फिर वे एक-दम से भड़क कर गुस्से से फट पडीं.
हाँ, पढी-लिखी हूँ, बताइये, क्या करूँ ? पढ़े-लिखे होने से क्या होता है. हम ब्राह्मण हैं न. हमारे कई पीढी पहले के दादों-पड्दादों ने शायद कभी पाप किये होंगे, हरिजनों पर अत्याचार किये होंगे, सजा तो मिलेगी न, हमारी कई पीढ़ियों के भविष्य कुचल दिए जायेंगे, उन्हें पीछे धकेला जायेगा. लंगड़ी दौड़ कराई जायेगी, दो पांव वाला हारेगा, लंगड़ा जीतेगा. सभी संस्थानों में अक्षम और अधूरे लोग भर दिए जायेंगे. प्रतिभाओं को पीछे धकेला जाएगा,भले वे अमेरिका-रूस,ब्रिटेन जाकर वहां की तरक्की में योगदान दें, भारत में उनका क्या काम. फिर देश की गिरती शिक्षा-व्यस्था,अर्थ-व्यस्था, उत्पादकता, गुणवत्ता. पर घडियाली आँसू बहाए जायेंगे. हाँ मैं पढी-लिखी हूँ. हो गई थी सेलेक्ट टीचर-शिप में पर मौखिक साक्षात्कार में मुझे रिजेक्ट करके एक हायर-सेकेंडरी को चुना गया,कोटा पूरा करना था न, महिला बाल विकास में भी ऐसा ही हुआ. प्रायवेट स्कूल गयी, वहाँ भी शोषण, ४०००/- रूपये देकर १००००/- की रसीद पर दस्तखत कराते थे. ये भी चल जाता पर रोज लालची निगाहें मेरी सुन्दरता पर. समझ गए पढ़ाई की कीमत, कुछ नहीं होता पढाई से. चूल्हे-चौके-बर्तन-झाड़ू तक की कोशिश कर डाली, किसी ने नहीं रखा. ब्राह्मण से ये कराकर पाप में लदना है क्या? हर जगह से यही नकारात्मक उत्तर. अब क्या करें ? सड़क पर भीख मांगने लगें क्या? और हाँ, क्या कह रहे थे आप ? हेल्दी डाईट ? आपको मेरे पति ने जो फीस दी है वो १५ दिन की चढौत्री के पैसे है मंदिर की आरती के.
पार्टी कोई भी आ जाय, सबका एक ही एजेंडा..हमारे हरिजन,पिछड़ी जाति के भाई उन्हें मुफ्त में जमीन के पट्टे, मुफ्त गेहूं, मुफ्त चावल बाँटो, मुफ्त बिजली दो देश के पूरे संसाधन मुफ्त दे दो क्योंकि गरीब तो सिर्फ हरिजन या पिछड़ी जाति का ही हो सकता है और तो कोई बचा ही नहीं है देश में गरीब . अरे उन्हें सक्षम बनाकर स्वस्थ प्रतिस्पर्धा तो होने दीजिये. इस लंगडी दौड़ का कभी अंत होगा या नहीं. हम सवर्ण क्या समुद्र में डूबकर मर जाएँ. अब तो बोलना तक गुनाह हो गया. हमारे हित की कोई जरा सी बात कर दे तो वह मनुवादी हो गया, साम्प्रदायिक हो गया, फिर तो टूट पड़ेंगे सब, तोड़-फोड़ होने लगेगी, आग लगा दी जायेगी देश में, चाहे नेता हो या मीडिया. सभी पड़ जायेंगे पीछे. डाक्टर साहब- हमारे घर जाकर देखिये, गरीबी जाति पूँछकर नहीं आती. चूहे भी भाग गये हैं घर से. कुछ खाने को मिले तब ना.
इतने लम्बी डांट से तो डाक्टर भी घबरा गया. वो कुछ बोलता इसके पहले ही पंडिताइन उठीं और घर के ओर दौड़ लगा दी. डाक्टर भी समझ गया कि इस गरीबी का इलाज तो उसके पास भी नहीं है. और पंडिताइन भी कहीं से गलत नहीं हैं. पर इस देश की व्यस्था को बदलना तो उनके बस की क्या, किसी के भी बस की बात नहीं है. अब तो कोई तानाशाह ही इस व्यवस्था को बदल सकता है. प्रजातंत्र में तो यह संभव नहीं दिखती. पंडित जी के घर की व्यवस्था में कोई अंतर नहीं आया. पंडिताइन तो बस पत्थर की मूर्ति बनी रहीं. वास्तव में वे “पत्थर की अहिल्या” बन चुकी थीं किसी शाप-ग्रस्त सी. जिसमे कोई भावनाएं नहीं. न शोक, न दुःख , न भय, न खुशी, न क्रोध, एक असीम विरक्ति, और कुछ भी नहीं.
समस्या का समाधान होते न देख पंडित जी ने अपने बड़े भाई को शहर से बुलाया.. वे पढ़े-लिखे, समझदार, वाकपटु और भले मानुष थे. उन्होंने पूरी स्थिति का बारीकी से अध्ययन किया और निकल पड़े गाँव में. पहचान व वाकपटुता खूब थी, सामने वाले को प्रभावित करने की अच्छी क्षमता थी, शाम तक ८-१० बच्चों को इकट्ठा कर के ले आये और बोले बहू- तुम बिलकुल भी दुखी मत होना. भगवान् ने हमे ये कीमती शरीर दिया है, ये किसी आरक्षण या राजनीतिक कृपा का मोहताज नहीं है. घर तक सीमित रहकर, किस्मत को कोसना, दुखी होना, गुस्सा करना, अपने-आप को आफत का मारा समझना इससे लोगों से कोरी सहानुभूति तो पायी जा सकती है, पर समस्याओं का कोई हल नहीं निकल सकता. इन बच्चों को आप रोज ट्यूशन पढ़ायें, और इतनी मेहनत से पढ़ायें कि इन बच्चों के सर्वाधिक अंक आयें, ये बच्चे अलग दिखें. मेरा दावा है इसके बाद आपको किसी को ढूढने नहीं जाना पड़ेगा. लोग स्वयं आपके पास आयेंगे. जमाना कितना खराब क्यों न हो जाए, प्रतिभा की कद्र तो हमेशा रहेगी. कई बच्चों की फीस उनके पिता ने अग्रिम दे दी है.आप आज से ही पढाना शुरू कर दें. कोई दिक्कत आये तो मैं हूँ. आप बेफिक्र रहें. मैं अभी कुछ दिन यहीं हूँ, जब तक सब कुछ ठीक नहीं हो जाता.
लगभग एक सप्ताह में सब कुछ सामान्य हो चुका था. बच्चे स्कूल जाने लगे थे. जाते समय पंडित जी बड़े भाई के पैर पकड़कर खूब रोये, बोले- आपने मेरा परिवार बचा लिया. एक राम थे जिन्होंने त्रेता युग में पत्थर की शिला को अहिल्या बना दिया था. मैं मूरख,पंडिताई तो खूब सीख ली पर लोक व्यवहार नहीं सीख पाया और अच्छी-खासी देवी को पत्थर की शिला बना दिया था. आप ही हमारे कलियुग के राम हो जिसने पत्थर की शिला को फिर से अहिल्या बना दिया, और मेरे परिवार को बिखरने से बचा लिया. भाई ने गले लगाकर छोटे भाई के सर पर हाथ फेरा और कान में बोले, छोटे वक्त बदल गया है. मंदिर में ठाकुर जी के सेवा को सेवा समझकर ही करो, आजीविका मत समझो उसे. कहीं लिखा-पढ़ी, मुनीमी, या सेल्समेन का कम पकड़ लो. कहावत नहीं सुनी तुमने “अपना हाथ, जगन्नाथ” इस जीवन की महाभारत में अपना युद्ध स्वयं लड़ना पड़ता है, तुम दोनों मेहनत करोगे, तभी परिवार चल पायेगा, क्योंकि अब मंदिरों की भीड़ शराबखानों और होटलों में चली गई है, समझे कुछ. सुनकर पंडित जी के ज्ञान-चक्षु खुल गए और उस दिन से परिवार का कायाकल्प हो गया.
GOKUL SONI......MOB..... 7415733130________________________



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