हास्य और व्यंग्य

एक लघु व्यंग्य) ‘सच’
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मैं, झूठ का आलोचक /
मैं, सच का उपासक /
क्योंकि, झूठ,‘झूठ’ होता है /
और सच, ‘सच’ /
फिर भी, वह ‘सच’ /
मेरे बहुत काम आता है /
जो, या तो मेरे ‘पक्ष’ में हो /
या, ‘स्वार्थ-सिद्धि’ हेतु /
झूठ के ताने-बाने से /
‘तोड़-मरोड़’ कर बुना जाता है /
गोकुल सोनी ***. ०२-११-२०१६
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एक बुन्देली रचना.
काम तुम्हारे इतने घटिया, का बोलें, भगवान् कसम /
खडी करी जनता की खटिया, का बोलें भगवान् कसम /
कैसी-कैसी रिश्वत खोरी, कैसे कैसे घोटाले /
खूब डुबाई देश की लुटिया, का बोलें, भगवान् कसम /
अधन-गधन खों कुर्सी दे दई, पढ़े-लिखों खों बेकारी /
लूट खाई बापू की कुटिया, का बोलें भगवान् कसम /
जिनने पैलें डांके डारे, सूट-बूट पैरें फिर रये /
भले-भलन खों बची लंगुटिया, का बोलें, भगवान् कसम /
बैठ बिलैया, दूध रखा रई, पी रई कछू मचा रई है /
जनता को धन, अटीया-बटिया, का बोलें, भगवान् कसम /
गोकुल सोनी <><><><> २३-१०-१६
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